वो यात्रा जो सफलता से अधिक संघर्ष बयाँ करती है।

आज भारत विश्व में अपनी नई पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है। वो भारत जो कल तक गाँधी का भारत था जिसकी पहचान उसकी सहनशीलता थी, आज मोदी का भारत है जो खुद पहल करता नहीं, किसी को छेड़ता नहीं लेकिन अगर कोई उसे छेड़े तो छोड़ता भी नहीं। गाँधी के भारत से शायद ही किसी ने सर्जिकल स्ट्राइक

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राजनीति को शर्मसार करती महाराष्ट्र की घटनाएं

महाराष्ट्र की राजनीति में इस वक्त भूचाल आया हुआ है।   जिस प्रकार से बीएमसी ने अवैध बताते हुए नोटिस देने के 24 घंटो के भीतर ही एक अभिनेत्री के दफ्तर पर बुलडोजर चलाया और अपने इस कारनामे के लिए कोर्ट में मुंह की भी खाई उससे राज्य सरकार के लिए भी एक असहज स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे बचने के लिए भले ही शिवसेना कहे कि यह बीएमसी का कार्यक्षेत्र है और सरकार का उससे कोई लेना देना नहीं है लेकिन उस दफ्तर को तोड़ने की टाइमिंग इस बयान में फिट नहीं बैठ रही।क्योंकि बीएमसी द्वारा इस कृत्य को ऐसे समय में अंजाम दिया गया है जब कुछ समय से उस अभिनेत्री और शिवसेना के एक नेता के बीच जुबानी जंग चल रही थी। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूरी मुंबई अवैध निर्माण अतिक्रमण और जर्जर इमारतों से त्रस्त है। अतिक्रमण की बात करें तो चाहे मुंबई के फुटपाथ हों चाहे पार्क कहाँ अतिक्रमण नहीं है? और जर्जर इमारतों की बात करें तो अभी लगभग दो महीने पहले ही मुंबई में दो जर्जर इमारतों के गिरने से कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कितने ही घायल हो गए। बरसात के मौसम में मुंबई का डूबना तो अब खबर भी नहीं बनती लोग इसके आदि हो चुके हैं। फिर भी कोरोना काल और मानसून के इस मौसम में एक विशेष बिल्डिंग के निर्माण में कानून के पालन को निश्चित करने में बीएमसी की तत्परता ने पूरे देश को आकर्षित कर दिया।  दरअसल यहाँ बात एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि बात इस देश के किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की है। बात किसी तथाकथित अवैध निर्माण को गिरा देने की नहीं है बल्कि बात तो सरकार की अपने देशवासियों के प्रति दायित्वों की है।  हमारे यहाँ कहा जाता है, प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितं।” अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख है प्रजा के हित में राजा का हित है।  भारत एक ऐसा देश है जो सदियों ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा और  जिसकी पीढ़ियों ने इस आज़ादी के लिए संघर्ष किया। आज जब  उस आज़ाद देश में  एक ऐसा अपराधी जो मोस्ट वांटेड है उसकी प्रॉपर्टी सीना ताने खड़ी रहती है लेकिन एक टैक्सपेयर की बिल्डिंग तोड़ दी जाती है। जब कोर्ट द्वारा उस अपराधी की 80 साल पुरानी जर्जर एवं अवैध बिल्डिंग को नेस्तनाबूद करने के एक साल पुराने आदेश के बावजूद मानसून का हवाला देकर उसे हाथ तक नहीं लगाया जाता। जब  30 सितंबर तक कोरोना के चलते किसी भी तोड़ फोड़ पर  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाई जाने के बावजूद एक महिला की बिल्डिंग पर बुलडोजर चला दिया जाता है। जब सरकार विरोधी रिपोर्टिंग करने के कारण कुछ पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है।जब सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी कुछ सामग्री पोस्ट करने के कारण किसी दल विशेष के कार्यकर्ता एक पुर्व नौसेना अधिकारी पर हिंसक आक्रमण करते हैं। तो एक आम जिस प्रकार से बीएमसी ने अवैध बताते हुए नोटिस देने के 24 घंटो के भीतर ही एक अभिनेत्री के दफ्तर पर बुलडोजर चलाया और अपने इस कारनामे के लिए कोर्ट में मुंह की भी खाई उससे राज्य सरकार के लिए भी एक असहज स्थिति उत्पन्न हो गई है। इससे बचने के लिए भले ही शिवसेना कहे कि यह बीएमसी का कार्यक्षेत्र है और सरकार का उससे कोई लेना देना नहीं है लेकिन उस दफ्तर को तोड़ने की टाइमिंग इस बयान में फिट नहीं बैठ रही।क्योंकि बीएमसी द्वारा इस कृत्य को ऐसे समय में अंजाम दिया गया है जब कुछ समय से उस अभिनेत्री और शिवसेना के एक नेता के बीच जुबानी जंग चल रही थी। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पूरी मुंबई अवैध निर्माण अतिक्रमण और जर्जर इमारतों से त्रस्त है। अतिक्रमण की बात करें तो चाहे मुंबई के फुटपाथ हों चाहे पार्क कहाँ अतिक्रमण नहीं है? और जर्जर इमारतों की बात करें तो अभी लगभग दो महीने पहले ही मुंबई में दो जर्जर इमारतों के गिरने से कई लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और कितने ही घायल हो गए। बरसात के मौसम में मुंबई का डूबना तो अब खबर भी नहीं बनती लोग इसके आदि हो चुके हैं। फिर भी कोरोना काल और मानसून के इस मौसम में एक विशेष बिल्डिंग के निर्माण में कानून के पालन को निश्चित करने में बीएमसी की तत्परता ने पूरे देश को आकर्षित कर दिया।  दरअसल यहाँ बात एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि बात इस देश के किसी भी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की है। बात किसी तथाकथित अवैध निर्माण को गिरा देने की नहीं है बल्कि बात तो सरकार की अपने देशवासियों के प्रति दायित्वों की है।  हमारे यहाँ कहा जाता है, प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां तु हिते हितं।” अर्थात प्रजा के सुख में राजा का सुख है प्रजा के हित में राजा का हित है।  भारत एक ऐसा देश है जो सदियों ग़ुलामी की जंजीरों में जकड़ा रहा और  जिसकी पीढ़ियों ने इस आज़ादी के लिए संघर्ष किया। आज जब  उस आज़ाद देश में  एक ऐसा अपराधी जो मोस्ट वांटेड है उसकी प्रॉपर्टी सीना ताने खड़ी रहती है लेकिन एक टैक्सपेयर की बिल्डिंग तोड़ दी जाती है। जब कोर्ट द्वारा उस अपराधी की 80 साल पुरानी जर्जर एवं अवैध बिल्डिंग को नेस्तनाबूद करने के एक साल पुराने आदेश के बावजूद मानसून का हवाला देकर उसे हाथ तक नहीं लगाया जाता। जब  30 सितंबर तक कोरोना के चलते किसी भी तोड़ फोड़ पर  सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाई जाने के बावजूद एक महिला की बिल्डिंग पर बुलडोजर चला दिया जाता है। जब सरकार विरोधी रिपोर्टिंग करने के कारण कुछ पत्रकारों को जेल में डाल दिया जाता है।जब सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी कुछ सामग्री पोस्ट करने के कारण किसी दल विशेष के कार्यकर्ता एक पुर्व नौसेना अधिकारी पर हिंसक आक्रमण करते हैं। तो एक आम

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राजस्थान में अभी पायलट का दांव बाकी है।

राजस्थान प्रदेश प्रभारी के पद पर अविनाश पांडे की जगह अजय माकन की ताज़ा नियुक्ति इस बात का संकेत है कि  राजस्थान की राजनीति में अभी बहुत कुछ बाकी है। सचिन पायलट और अशोक गहलोत की हाथ मिलाती तस्वीरों से भले ही यह संदेश देने की कोशिश की गई हो कि सब कुछ सामान्य हो गया है लेकिन अजय माकन के

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15 अगस्त सिर्फ जश्न का नहीं आत्ममंथन का भी दिन

भारत हर वर्ष 15 अगस्त को अपना स्वाधीनता दिवस मनाता है।यह दिन जहां हमारे आजाद होने की खुशी लेकर आता है, वहीं इसमें भारत के खण्ड खण्ड होने का दर्द भी छिपा होता है।वक्त के गुजरे पन्नों में भारत से ज्यादा गौरवशाली इतिहास किसी भी देश का नहीं हुआ।लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा सांस्कृतिक राजनैतिक सामरिक और आर्थिक हमले भी इतिहास में

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कब तक सामने आते रहेंगे प्यारेमियाँ जैसे चरित्र ?

“हरचेहरेपरनकाबहैयहाँ बेनकाबकोईचेहरानहीं हरदामनमेंदागहैयहाँ बेदागकोईदामननहीं। यहअजीबशहरहैजहाँ औरतबेपर्दाकरदीजातीहैलेकिन सफेदपोशोंकेनकाबकायमहैंयहाँ” मध्यप्रदेश की राजधानी एक बार फिर कलंकित हुई। एक बार फिर साबित हुआ कि हम एक सभ्य समाज होने का कितना भी ढोंग करें लेकिन सत्य बेहद कड़वा है।  प्यारेमियाँ तो केवल वो नाम है जो सामने आया है ऐसे कितने ही नाम अभी भी गुमनाम हैं। प्यारेमियाँ तो मात्र वो चेहरा है

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उदारवादियों के सिलेक्टिव लिब्रलिस्म से पर्दा उठने लगा है।

आज हम उस समाज में जी रहे हैं जिसे अपने दोहरे चरित्र का प्रदर्शन करने में महारत हासिल है। वो समाज जो एकतरफ अपने उदारवादी होने का ढोंग करता है, महिला अधिकारों, मानव अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बड़े बड़े आंदोलन और बड़ी बड़ी बातें करता है लेकिन जब इन्हीं अधिकारों का उपयोग करते हुए कोई महिला

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लोकतंत्र तो अधिकार देता है पर उदारवादी नहीं

आज हम उस समाज में जी रहे हैं जिसे अपने दो हरेचरित्र का प्रदर्शन करने में महा रतहासिल है।वोसमाज जो एक तरफ अपने उदारवादी होने का ढोंग करता है, महिला अधिकारों, मानव अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बड़े -बड़े आंदोलन और बड़ी बड़ी बातें करता है लेकिन जब इन्हीं अधिकारों का उपयोग करते हुए कोई महिला या

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भारतीय प्रतिभाओं के बिना भारत आगे नहीं जा सकता

किसी भी देश की शक्ति होते हैं उसके नागरिक और अगर वो युवा हों तो कहने ही क्या। भारत एक ऐसा ही युवा देश है। हाल ही में भारतीय जनसंख्या आयोग के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से तैयार किए गए सैंपल रेजिस्ट्रेशन सिस्टम 2018 की रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में 25 वर्ष से कम आयु वाली आबादी 46.9% है।

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भारतीय प्रतिभाओं के बिना भारत आगे नहीं जा सकता

किसीभीदेशकीशक्तिहोतेहैंउसकेनागरिकऔरअगरवोयुवाहोंतोकहनेहीक्या।भारतएकऐसाहीयुवादेशहै।हालहीमेंभारतीयजनसंख्याआयोगकेरजिस्ट्रारजनरलकीओरसेतैयारकिएगएसैंपलरेजिस्ट्रेशनसिस्टम 2018 कीरिपोर्टकेअनुसारहमारेदेशमें 25 वर्षसेकमआयुवालीआबादी 46.9% है।इसमें 25 वर्षकीआयुसेकमपुरूषआबादी 47.4%  और महिला आबादी 46.3%। यह आंकड़े किसी भी देश को प्रोत्साहित करने के लिए काफी हैं। भारत जैसे देश के लिए भी यह आंकड़े अनेकों अवसर और आशा की किरणें जगाने वाले हैं लेकिन सिर्फ आंकड़ो से ही उम्मीदें पूरी नहीं होती, उम्मीदों को अवसरों में बदलना पड़ता है।  इसे हम भारत का दुर्भाग्य कहें या फिर गलत नीतियों का असर कि हम एक देश के नाते अपने इन अवसरों का उपयोग नहीं कर पाते और उन्हें उम्मीद बनने से पहले ही बहुत आसानी से इन उम्मीदों को दूसरे देशों के हाथों में फिसलने देते हैं। हमारे प्रतिभावान और योग्य युवा जो इस देश की ताकत हैं जिनमें इस देश की उम्मीदों को अवसरों में बदलने की क्षमता है वो अवसरों की तलाश में विदेश चले जाते हैं। जो युवा इस देश का एक बार फिर से विश्वगुरु बनाने का सपना साकार करने में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं वो अपने सपनों को साकार करने के लिए इस देश से पलायन करने के लिए विवश हो जाते हैं। जी हाँ यह कटु सत्य है कि ब्रेन ड्रेनेज का शिकार होने वाले देशों

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आत्मनिर्भर होने के मायने तलाशने होंगे

आजकल देश में सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर चीन को बॉयकॉट करने कीमुहिम चल रही है। इससे पहले कोविड 19 के परिणामस्वरूप जब देश की अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव सामने आने लगे थे तो प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत का मंत्र दिया था। उस समय यह मंत्र देश की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक लाभ पहुंचाने की दृष्टि से उठाया गया एक मजबूत कदम था जो आज  भारत चीन सीमा विवाद के

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